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शल्य पर्व
अध्याय ५७
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वासुदेव उवाच
आधुन्वन्तौ गदे घोरे चन्दनागरुरूषिते |  २२   क
वैरस्यान्तं परीप्सन्तौ रणे क्रुद्धाविवान्तकौ ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति