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वन पर्व
अध्याय ६६
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वृहदश्व उवाच
यदि चापि प्रिय़ं किञ्चिन्मय़ि कर्तुमिहेच्छसि |  १९   क
विदर्भान्यातुमिच्छामि शीघ्रं मे यानमादिश ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति