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वन पर्व
अध्याय ६६
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वृहदश्व उवाच
ततः सा नचिरादेव विदर्भानगमच्छुभा |  २२   क
तां तु वन्धुजनः सर्वः प्रहृष्टः प्रत्यपूजय़त् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति