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वन पर्व
अध्याय ६६
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वृहदश्व उवाच
सा व्युष्टा रजनीं तत्र पितुर्वेश्मनि भामिनी |  २६   क
विश्रान्ता मातरं राजन्निदं वचनमव्रवीत् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति