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वन पर्व
अध्याय ६६
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सुदेव उवाच
अस्या रूपेण सदृशी मानुषी नेह विद्यते |  ५   क
अस्याश्चैव भ्रुवोर्मध्ये सहजः पिप्लुरुत्तमः |  ५   ख
श्यामाय़ाः पद्मसङ्काशो लक्षितोऽन्तर्हितो मय़ा ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति