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वन पर्व
अध्याय १९२
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वैशम्पाय़न उवाच
एतदिच्छामि तत्त्वेन ज्ञातुं भार्गवसत्तम |  ५   क
विपर्यस्तं यथा नाम कुवलाश्वस्य धीमतः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति