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विराट पर्व
अध्याय ६६
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रसादनं पाण्डवस्य प्राप्तकालं हि रोचय़े |  १६   क
उत्तरां च प्रय़च्छामि पार्थाय़ यदि ते मतम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति