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विराट पर्व
अध्याय ६६
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो विराटः परमाभितुष्टः; समेत्य राज्ञा समय़ं चकार |  २१   क
राज्यं च सर्वं विससर्ज तस्मै; सदण्डकोशं सपुरं महात्मा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति