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विराट पर्व
अध्याय ६६
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वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवांश्च ततः सर्वान्मत्स्यराजः प्रतापवान् |  २२   क
धनञ्जय़ं पुरस्कृत्य दिष्ट्या दिष्ट्येति चाव्रवीत् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति