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वन पर्व
अध्याय ५८
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वृहदश्व उवाच
ततस्तु याते वार्ष्णेय़े पुण्यश्लोकस्य दीव्यतः |  १   क
पुष्करेण हृतं राज्यं यच्चान्यद्वसु किञ्चन ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति