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शल्य पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
पटहाञ्झर्झरांश्चैव कृकचान्गोविषाणिकान् |  ५१   क
आडम्वरान्गोमुखांश्च डिण्डिमांश्च महास्वनान् ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति