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शल्य पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं तय़ोर्महाराज दीर्घकालो व्यतिक्रमत् |  ८   क
जैगीषव्यं मुनिं चैव न ददर्शाथ देवलः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति