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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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व्यास उवाच
रुद्रमीशानमृषभं चेकितानमजं परम् |  ५७   क
गच्छतस्तिष्ठतो वापि सर्वभूतहृदि स्थितम् ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति