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शान्ति पर्व
अध्याय ८३
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मुनिरु उवाच
भवतैव कृता राजन्भवता परिपालिताः |  ४९   क
भवन्तं पर्यवज्ञाय़ जिघांसन्ति भवत्प्रिय़म् ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति