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शान्ति पर्व
अध्याय १३७
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पूजन्यु उवाच
नेत्राभ्यां सरुजाभ्यां यः प्रतिवातमुदीक्षते |  ७३   क
तस्य वाय़ुरुजात्यर्थं नेत्रय़ोर्भवति ध्रुवम् ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति