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द्रोण पर्व
अध्याय ६६
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सञ्जय़ उवाच
स तु द्रोणं समासाद्य व्यूहस्य प्रमुखे स्थितम् |  २   क
कृताञ्जलिरिदं वाक्यं कृष्णस्यानुमतेऽव्रवीत् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति