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द्रोण पर्व
अध्याय ६६
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सञ्जय़ उवाच
तं पाण्डवादित्यशरांशुजालं; कुरुप्रवीरान्युधि निष्टपन्तम् |  २१   क
स द्रोणमेघः शरवर्षवेगैः; प्राच्छादय़न्मेघ इवार्करश्मीन् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति