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द्रोण पर्व
अध्याय ६६
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सञ्जय़ उवाच
स विह्वलितसर्वाङ्गः क्षितिकम्पे यथाचलः |  २३   क
धैर्यमालम्व्य वीभत्सुर्द्रोणं विव्याध पत्रिभिः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति