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द्रोण पर्व
अध्याय ६६
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु पञ्चभिर्वाणैर्वासुदेवमताडय़त् |  २४   क
अर्जुनं च त्रिसप्तत्या ध्वजं चास्य त्रिभिः शरैः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति