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शल्य पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
स तु दीर्घेण कालेन प्रत्याश्वस्तो महीपतिः |  ४५   क
तूष्णीं दध्यौ महीपालः पुत्रव्यसनकर्शितः |  ४५   ख
निःश्वसञ्जिह्मग इव कुम्भक्षिप्तो विशां पते ||  ४५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति