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कर्ण पर्व
अध्याय ६६
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सञ्जय़ उवाच
हराम्वुपाखण्डलवित्तगोप्तृभिः; पिनाकपाशाशनिसाय़कोत्तमैः |  १५   क
सुरोत्तमैरप्यविषह्यमर्दितुं; प्रसह्य नागेन जहार यद्वृषः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति