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कर्ण पर्व
अध्याय ६६
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सञ्जय़ उवाच
तदुत्तमेषून्मथितं विषाग्निना; प्रदीप्तमर्चिष्मदभिक्षिति प्रिय़म् |  १६   क
पपात पार्थस्य किरीटमुत्तमं; दिवाकरोऽस्तादिव पर्वताज्ज्वलन् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति