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कर्ण पर्व
अध्याय ६६
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सञ्जय़ उवाच
ततः किरीटं वहुरत्नमण्डितं; जहार नागोऽर्जुनमूर्धतो वलात् |  १७   क
गिरेः सुजाताङ्कुरपुष्पितद्रुमं; महेन्द्रवज्रः शिखरं यथोत्तमम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति