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वन पर्व
अध्याय १७६
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वैशम्पाय़न उवाच
स भीमसेनस्तेजस्वी तथा सर्पवशं गतः |  १   क
चिन्तय़ामास सर्पस्य वीर्यमत्यद्भुतं महत् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति