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कर्ण पर्व
अध्याय ६६
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सञ्जय़ उवाच
तदर्जुनास्त्रं ग्रसते स्म वीरा; न्विय़त्तथाकाशमनन्तघोषम् |  २   क
क्रुद्धेन पार्थेन तदाशु सृष्टं; वधाय़ कर्णस्य महाविमर्दे ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति