कर्ण पर्व  अध्याय ६६

कृष्ण उवाच

ततस्तु जिष्णुः परिहृत्य शेषां; श्चिच्छेद षड्भिर्निशितैः सुधारैः |  २४   क
नागं विय़त्तिर्यगिवोत्पतन्तं; स छिन्नगात्रो निपपात भूमौ ||  २४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति