कर्ण पर्व  अध्याय ६६

कृष्ण उवाच

ततो वृषो वाणनिपातकोपितो; महोरगो दण्डविघट्टितो यथा |  २८   क
तथाशुकारी व्यसृजच्छरोत्तमा; न्महाविषः सर्प इवोत्तमं विषम् ||  २८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति