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कर्ण पर्व
अध्याय ६६
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कृष्ण उवाच
जनार्दनं द्वादशभिः पराभिन; न्नवैर्नवत्या च शरैस्तथार्जुनम् |  २९   क
शरेण घोरेण पुनश्च पाण्डवं; विभिद्य कर्णोऽभ्यनदज्जहास च ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति