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कर्ण पर्व
अध्याय ६६
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कृष्ण उवाच
मणिप्रवेकोत्तमवज्रहाटकै; रलङ्कृतं चास्य वराङ्गभूषणम् |  ३२   क
प्रविद्धमुर्व्यां निपपात पत्रिभि; र्धनञ्जय़ेनोत्तमकुण्डलेऽपि च ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति