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कर्ण पर्व
अध्याय ६६
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कृष्ण उवाच
दृढाहतः पत्रिभिरुग्रवेगैः; पार्थेन कर्णो विविधैः शिताग्रैः |  ३६   क
वभौ गिरिर्गैरिकधातुरक्तः; क्षरन्प्रपातैरिव रक्तमम्भः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति