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कर्ण पर्व
अध्याय ६६
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कृष्ण उवाच
वलेनाथ स संस्तभ्य व्रह्मास्त्रं समुदैरय़त् |  ४८   क
ऐन्द्रास्त्रमर्जुनश्चापि तद्दृष्ट्वाभिन्यमन्त्रय़त् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति