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कर्ण पर्व
अध्याय ६६
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कृष्ण उवाच
ततोऽन्यमग्निसदृशं शरं सर्पविषोपमम् |  ५८   क
अश्मसारमय़ं दिव्यमनुमन्त्र्य धनञ्जय़ः ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति