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कर्ण पर्व
अध्याय ६६
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कृष्ण उवाच
प्रकीर्णकेशे विमुखे व्राह्मणे च कृताञ्जलौ |  ६२   क
शरणागते न्यस्तशस्त्रे तथा व्यसनगेऽर्जुन ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति