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वन पर्व
अध्याय २१६
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मार्कण्डेय़ उवाच
त्यक्तो देवैस्ततः स्कन्दे वज्रं शक्रोऽभ्यवासृजत् |  १२   क
तद्विसृष्टं जघानाशु पार्श्वं स्कन्दस्य दक्षिणम् |  १२   ख
विभेद च महाराज पार्श्वं तस्य महात्मनः ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति