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उद्योग पर्व
अध्याय १४
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शल्य उवाच
यदि न त्रास्यसि विभो करिष्यति स मां वशे |  १४   क
एतेन चाहं सन्तप्ता प्राप्ता शक्र तवान्तिकम् |  १४   ख
जहि रौद्रं महावाहो नहुषं पापनिश्चय़म् ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति