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आदि पर्व
अध्याय ६७
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वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञाय़ाथ च तां कण्वो दिव्यज्ञानो महातपाः |  २४   क
उवाच भगवान्प्रीतः पश्यन्दिव्येन चक्षुषा ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति