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शान्ति पर्व
अध्याय ६७
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भीष्म उवाच
प्रीय़ते हि हरन्पापः परवित्तमराजके |  १३   क
यदास्य उद्धरन्त्यन्ये तदा राजानमिच्छति ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति