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शान्ति पर्व
अध्याय ६७
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भीष्म उवाच
अराजकाः प्रजाः पूर्वं विनेशुरिति नः श्रुतम् |  १७   क
परस्परं भक्षय़न्तो मत्स्या इव जले कृशान् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति