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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८६
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा तस्मिन्महाय़ज्ञे धर्मराजस्य धीमतः |  २२   क
समाजग्मुर्मुनिगणा वहवो व्रह्मवादिनः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति