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द्रोण पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा यय़ौ तूर्णं त्वरमाणो युधिष्ठिरः |  ४८   क
स विस्फार्य महच्चापं शङ्खं प्रध्माप्य भैरवम् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति