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शान्ति पर्व
अध्याय ६७
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भीष्म उवाच
नमस्येय़ुश्च तं भक्त्या शिष्या इव गुरुं सदा |  ३३   क
देवा इव सहस्राक्षं प्रजा राजानमन्तिके ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति