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शान्ति पर्व
अध्याय ६७
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भीष्म उवाच
सत्कृतं स्वजनेनेह परोऽपि वहु मन्यते |  ३४   क
स्वजनेन त्ववज्ञातं परे परिभवन्त्युत ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति