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अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
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यम उवाच
तिला भक्षय़ितव्याश्च सदा त्वालभनं च तैः |  १८   क
कार्यं सततमिच्छद्भिः श्रेय़ः सर्वात्मना गृहे ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति