अनुशासन पर्व  अध्याय ६७

यम उवाच

एतत्सुदुर्लभतरमिह लोके द्विजोत्तम |  २०   क
आपो नित्यं प्रदेय़ास्ते पुण्यं ह्येतदनुत्तमम् ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति