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अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
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यम उवाच
नीत्वा तं यमदूतोऽपि गृहीत्वा शर्मिणं तदा |  २३   क
यय़ौ स धर्मराजाय़ न्यवेदय़त चापि तम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति