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अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
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यम उवाच
तं धर्मराजो धर्मज्ञं पूजय़ित्वा प्रतापवान् |  २४   क
कृत्वा च संविदं तेन विससर्ज यथागतम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति