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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
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वैशम्पाय़न उवाच
वार्ष्णेय़ मधुहन्वीर शिरसा त्वां प्रसादय़े |  १३   क
द्रोणपुत्रास्त्रनिर्दग्धं जीवय़ैनं ममात्मजम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति