शान्ति पर्व  अध्याय १९२

व्राह्मण उवाच

सैवाद्यापि प्रतिज्ञा मे स्वशक्त्या किं प्रदीय़ताम् |  ४६   क
व्रूहि दास्यामि राजेन्द्र विभवे सति माचिरम् ||  ४६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति