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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
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वैशम्पाय़न उवाच
अपां कुम्भैः सुपूर्णैश्च विन्यस्तैः सर्वतोदिशम् |  ४   क
घृतेन तिन्दुकालातैः सर्षपैश्च महाभुज ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति