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वन पर्व
अध्याय ६७
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वृहदश्व उवाच
यथा च वो न जानीय़ाच्चरतो भीमशासनात् |  १८   क
पुनरागमनं चैव तथा कार्यमतन्द्रितैः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति